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Wednesday, October 22, 2014

चरित्र निर्माण एवं त्यागवृत्ति से ही विश्वबंधुत्व संभव


स्वामी विवेकानन्द के शिकागो धर्मसम्मेलन में प्रथम उद्बोधन की वर्षगांठ पर विश्वबंधुत्व दिवस का अजमेर में आयोजन किया गया। विश्वबंधुत्व की संकल्पना को केवल चरित्र की उच्चता एवं त्यागवृत्ति के आचरण से ही साकार किया जा सकता है। भोगवाद से केवल विनाश ही हो सकता है तथा कट्टरता से संसार में बंधुत्व नहीं आ सकता। स्वामी विवेकानन्द ने जिस सत्यकालजयी संदेश का दर्शन पूज्य श्रीपाद शिला पर किया उसी दर्शन को विश्व के समक्ष 11 सितंबर 1893 में अमेरिका में शिकागो शहर में विश्व रिलीजन सम्मेलन में अपने मुखारविंद से अभिव्यक्त किया तथा यह घोषणा भी की कि यदि इस सत्य के दर्शन की उपेक्षा करके यदि विश्व में एकांतिक विचारधारा का सूत्रपात जारी रहेगा तो इस विश्व में विनाश की लीला को कोई नहीं रोक पाएगा और यह एक विडंबना ही है कि जिस 11 सितंबर 1893 को स्वामीजी ने उक्त विचारों को अमेरिका की धरती पर कहा था वही अमेरिका की धरती 11 सितंबर 2001 को ही आतंक की उस एकांतिक विचारधारा के परिणिति स्वरुप लहूलुहान हुई।  उक्त विचार प्रमुख शिक्षाविद्, चिंतक एवं लेखक हनुमानसिंह राठौड़ ने व्यक्त किए। वे विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी शाखा अजमेर द्वारा आयोजित समर्थ भारत - विश्वबंधुत्व का आधार विषय पर मुख्य वक्ता के रूप  में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि विश्व में जिन दो विचारधाराओं में टकराव हो रहा है वह विचारधाराएं शूपर्णखा और पूतना का प्रतिरूप हैं जो केवल इस एक विचार को मानती हैं कि केवल यह ही, किंतु संपूर्ण विश्व में बंधुत्व का संदेश देने वाली एकमात्र विचारधारा हिन्दुत्व विचारधारा है जो यह मानती है कि यह भी। हिन्दू संस्कृति में नास्तिक माना जाने वाला चार्वाक दर्शन भी भौतिकतावादी तो हो सकता है किंतु आसुरीवृत्ति वाला नहीं हो सकता। यही हिन्दू दर्शन की विशेषता है जिसकी घोषणा स्वामी विवेकानन्द ने संपूर्ण विश्व के समक्ष की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि दर्शन चाहे जितना भी उच्च कोटि का क्यों न हो उस दर्शन को संपूर्ण विश्व में स्थापित करने के पीछे सामथ्र्य होना चाहिए जो कि आज की युवा पीढ़ी में है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने प्रत्येक दायित्व के पीछे राष्ट्रभाव का जागरण करें जिससे कि ऐसी सामथ्र्य का निर्माण हो सके जिससे कि भारत पुनः विश्वगुरू के पर पर आसीन हो सके।

इस अवसर पर विवेकानन्द केन्द्र द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कृत भी किया गया जिसमें विद्यालय स्तर की चलवैजन्ती डीएवी शताब्दी विद्यालय तथा महाविद्यालय स्तर की चलवैजंती महिला अभियांत्रिकी महाविद्यालय, अजमेर को प्रदान की गई। देशभक्तिगान प्रतियोगिता में बाल वर्ग में डीएवी शताब्दी विद्यालय तथा किशोर वर्ग में डी.बी.एन. अंग्रेजी माध्यम विद्यालय ने प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजकीय महाविद्यालय, अजमेर के पूर्व उपप्राचार्य डाॅ. बी.के. भार्गव थे तथा अध्यक्षता डाॅ. बद्री प्रसाद पंचोली ने की। इस अवसर पर साहित्कार उमेश चैरसिया, नगर संचालक दिनेश अग्रवाल, नगर संगठक श्वेता भी उपस्थित रहीं।

इससे पूर्व अतिथियों का स्वागत स्वामी विवेकानन्द की पुस्तकों एवं श्रीफल से किया गया। कार्यक्रम की संकलप्ना डाॅ0 स्वतन्त्र शर्मा ने रखी तथा केन्द्र परिचय नवनीत जैन ने किया। कार्यक्रम का संचालन नगरप्रमुख कुसुम गौतम द्वारा किया गया। 

Thursday, May 3, 2012

विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी : शाखा अजमेर

विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी शाखा अजमेर अपने नए भवन में स्थापित

Gruh Praveshअजमेर २९ अप्रैल ! विवेकानंद केंद्र अजमेर शाखा अपने पुराने भवन जोकि श्रीनगर रोड स्थित प्रताप ऑटो मोबाइल के ऊपर स्थित था अब अपने नए भवन शिव मंदिर के पास, नई बस्ती भजन गंज में स्थानांतरित हो गया है.

उक्त नवीन भवन के उद्घाटन कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रातः काल कलश यात्रा के साथ हुआ जिसमे प्रान्त संघटक रचना एवं श्री गायत्री महिला मंडल भजन गंज अजमेर की श्रीमती सुधा डोगरा के नेत्रत्व में ३१ महिलाओ की कलश यात्रा निकाली गई

कलश स्थापना के उपरांत वास्तु यज्ञ एवं हवन का आयोजन किया गया जिसमे मुख्य यजमान विवेकानंद केंद्र के विभाग संचालक  श्री सत्य देव शर्मा थे तथा यज्ञ में विभाग प्रमुख अशोक पनिकर एवं नगर सह प्रमुख अविनाश शर्मा सपत्निक सम्मिलित हुए

विवेकानंद केंद्र द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जानकारी देते हुए प्रान्त संचालक श्री बद्री प्रसाद पंचोली ने बताया की अजमेर सबसे पुराना केंद्र पूरे भारत वर्ष में रहा है जिसकी शाखा अब अपने स्वयं के भवन में स्थापित की गई है! यह अजमेर के लिए अत्यंत गौरव की बात है.

उद्घाटन कार्यक्रम में नगर के अन्य गणमान्य व्यक्ति जिनमे श्री दिनेश अग्रवाल, शिव राज शर्मा प्रान्त प्रमुख, उमेश चोरासिया, रामचरण गुप्ता, देवेन्द्र पंवार, स्वतंत्र शर्मा, अविनाश शर्मा,  इत्यादि उपस्थित थे.

Kalash Yatra इस बारे में जानकारी देते हुए नगर प्रमुख कुसुम गौतम ने कहा कि अब विवेकानंद केंद्र के आने वाले कार्यक्रम जिनमे प्रमुख रूप से स्वामीजी की आगामी वर्ष में आने वाली १५० वी जन्म जयंती वर्ष हेतु किये जाने वाले कार्यक्रमों की योजना का निरूपण आसानी से हो सकेगा साथ ही केंद्र के कार्यपद्धति से जुड़े आयामों का प्रभाव जनमानस में और भी गहरा हो सकेगा.

कार्यक्रम के अंत में केंद्र प्रार्थना का आयोजन किया गया तथा अंत में प्रसादी का भी आयोजन हुआ .

Saturday, March 31, 2012

''संस्कृति रेणु'' साहित्य प्रदर्शनी का स्वागत : अजमेर

Renu Literary Culture Exhibition reception Ajmerअजमेर में लोगों संस्कृति रेणु के प्रति भारी उत्साह, ३००० से अधिक लोगों ने दो दिनों में साहित्य प्रदर्शनी का अवलोकन किया।

ईश्वर को प्राप्त करने के लिए संसार में अनेकानेक मार्ग हैं किंतु वेदान्त में ईश्वर कहता है कि कोई भी किसी भी मार्ग से मुझे भजे उसमें ही वह विलीन हो जाता है। स्वामी विवेकानन्द अपने समय से पूर्व के न केवल भारत अपितु सारे विश्व के समस्त दार्शनिकों, संतों, विचारकों की आभा जो समस्त मानवजाति का कल्याण करने के लिए कार्यरत है, को प्रकट करने वाले दिव्य रत्न हैं। रंग, लिंग, जाति, वर्ण, भाषा, भूषा तथा प्रान्त की बात नहीं, इन सभी से उपर उठकर प्रत्येक मनुष्य के भीतर परमात्मा के अंश का प्रकटीकरण का प्रयास करने वाला कोई दूसरा रत्नशिरोमणि विवेकानन्द के अलावा इस संसार में दूसरा कोई नहीं है।

Renu Literary Culture Exhibition reception Ajmerउक्त विचार राजस्थान लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रोफेसर परमेन्द्र कुमार दशोरा ने स्वामी विवेकानन्द के १५०वें जन्म जयन्ती वर्ष के उपलक्ष में विवेकानन्द केन्द्र द्वारा अजमेर में चलाई जा रही भारतीय संस्कृति एवं विवेकानन्द साहित्य की चल प्रदर्शनी ''संस्कृति रेणु'' के स्वागत हेतु विविध संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रम के अवसर पर व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि मानवता के प्रकटीकरण का मार्ग, विश्व में स्थापित एवं मान्य मत, पंथ, संप्रदायों का जो भी सारतत्व प्रकट हुआ है उसी का पूरा निचोड़ वेदान्त में है और उसी वेदान्त को उत्पन्न एवं जनसामान्य में प्रकट करने वाली पुण्य भूमि भारत है। स्वामी विवेकानन्द ने अपने संपूर्ण जीवन में उसी वेदान्त को प्रत्येक प्राणी में प्रकट करने का कार्य किया, वे पाथेय बने, मार्ग का निर्धारण किया एवं उस मार्ग पर चलकर प्राप्त होने वाली मंजिल को उन्होंने आने वाली युवा पीढी के लिए छोड  दिया। विवेकानन्द का साहित्य आज हमें बताता है कि कैसे हम स्वयं बन सकते हैं और दूसरों को बना सकते हैं। प्रोफसर दशोरा ने बताया कि आज की युवा पीढी के समक्ष जिज्ञासा उत्पन्न करना ही हमारा लक्ष्य हो, जिज्ञासा को दबाकर नहीं उसे शांत करके ही हम आगे बढ  सकते हैं। आज हमें स्वामी विवेकानन्द के साहित्य को पढ  कर उसे रट कर कुछ दृष्टांत दे देने वाले युवाओं की आवश्यकता नहीं है अपितु स्वामी विवेकानन्द का साहित्य समालोचन की दृष्टि से देखने वाले, उसमें तर्क ढूंढने वाले एवं ऐसे दिव्य युवा जो उसमें भी संशोधन निकाल सकें और सारतत्व का प्रकटीकरण कर सकें, ऐसे युवाओं की आवश्यकता है। ऐसे ही युवा समाज में विवेकानन्द के रूप में प्रकट हो सकते हैं। भारत में ही करोडों भारतवासी स्वामी विवेकानन्द बनने का सामर्थ्य रखते हैं। इस रत्न की रश्मियों को भारतवासियों रूपी दर्पण में प्रकाशित करने से ही भारत आगे बढ  सकता है। आज हमें रामकृष्ण सरीखा गृहस्थ जीवन बिताने की आवश्यकता है तभी हम स्वंय विवेकानन्द हो सकते हैं और नए विवेकानन्द का निर्माण कर सकते हैं। हमें शक्तियों का संचय करना होगा एवं नए विवेकानन्द तैयार करने होंगे। एक कदम तो बढ  चुका है आगे और कदम बढाए रखने की आवश्यकता है।

Renu Literary Culture Exhibition reception Ajmerइस अवसर पर चिति संधान केन्द्र की स्वामी अनादि सरस्वती ने बहुत ही भावुक रूप से स्वामी विवेकानन्द के जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि यदि विवेकानन्द बनने की ओर कदम बढाना है तो उनकी पत्रावलियों को ध्यान से पढ ना होगा। स्वामी विवेकानन्द एक ज्वाला थे। वे एक ऐसा चमकता हीरा थे जो न केवल सूर्य की रोशनी में अपितु अंधेरे में भी प्रकाशित होता था। एक हीरा तभी प्रकाशित होता है जब उसे तराशा जाता है। अतः जिस प्रकार हीरा तराशने का कार्य अनुभवी जौहरी के हाथों में ही हो सकता है उसी प्रकार एक विवेकानन्द बनने के लिए ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जैसा गुरू भी आवश्यक है।

इसी तरह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हनुमान सिंह जी ने भी विवेकानन्द के प्रति अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि विवेकानन्द तो एक ही सूर्य है उसके समान दूसरा कोई संसार में हो नहीं सकता।

भारत विकास परिषद्‌ की डॉ. कमला गोखरू ने इस अवसर पर कहा कि आगामी वर्ष में बच्चों एवं युवाओं में स्वामी विवेकानन्द के कार्यों को लेकर परिषद्‌ विद्यालयों में जाएगी तथा विवेकानन्द की शिक्षाओं एवं ज्ञान से आज की युवा पीढी को परिचित कराने का कार्य किया जाएगा।

समारोह में आगंतुकों ने संस्कृति रेणु का अवलोकन किया। इस अवसर पर विवेकानन्द केन्द्र के प्रान्त संचालक डॉ. बद्री प्रसाद पंचोली, प्रान्त प्रमुख श्री शिवराज शर्मा, विभाग प्रमुख अशोक पणिक्कर, सह विभाग प्रमुख स्वतन्त्र शर्मा, नगर संचालक दिनेश अग्रवाल, नगर प्रमुख कुसुम गौतम तथा नगर संगठक श्वेता दीदी उपस्थित थीं।

राजस्थान प्रान्त साहित्य सेवा प्रमुख उमेश चौरसिया ने बताया कि प्रथम चरण में १०४ दिन की संस्कृति रेणु की यात्रा में १५० विषयों पर आधारित पुस्तकों को सम्मिलित करते हुए राजस्थान के ५६ नगरों एवं कस्बों के ४०० स्थानों पर जाना निश्चित है तथा अजमेर में ७००० से अधिक लोगों ने इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया है तथा ३०८९०/- रूपये से अधिक का साहित्य लोगों द्वारा क्रय किया गया।

Monday, March 5, 2012

‘‘संस्कृति-रेणु’’ : भारतीय संस्कृति तथा साहित्य चल प्रदर्शनी

Samskruti renu ratha a mobile libraryस्वामी विवेकानन्द के साहित्य और विचारों को जन जन तक, प्रदेश के गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए संस्कृति-रेणु भारतीय संस्कृति तथा साहित्य चल प्रदर्शनी को एक पुस्तकालय का रूप भी  दिया गया है। जिसमें स्वामी विवेकानन्द के साहित्य को भली भांति प्रदर्शित किया गया हैं। १८ फ़रवरी, शनिवार को गोविंददेवजी मंदिर के सत्संग भवन में विवेकानंद केन्द्र राजस्थान की ओर से आयोजित ’’संस्कृति-रेणु’’ वाहन के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए विवेकानंद केन्द्र के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मा. बालकृष्णन ने कहा कि केन्द्र का उद्देष्य भारतीयों को संगठित कर उनमें आत्मिक शक्ति पैदा करना है। केन्द्र शिक्षा, ग्रामविकास, स्वास्थ्य, योग एवं सूर्य नमस्कार के माध्यम से देश की युवापीढ़ी को जागृत करने का काम कर रहा है।



उन्होंने कहा कि अगले वर्ष (2013-2014) को स्वामी विवेकानन्द की सार्ध षती समारोह के रूप में मनाया जाएगा। इसको ध्यान में रखते हुए हमने भारत को पाँच आयामों - युवक, सवंर्धिनी (महिला), प्रबुद्ध भारत (बुद्धिशक्ति), ग्रामायण और वनवासी को विषेष रूप से अपने सामने रखा है। इन क्षेत्रों में विवेकानन्द का संदेश ले जाने के लिए पूरे साल कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने पूर्वांचल के हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि आज भी वहाँ के कुछ राज्यों के लिए अपने को बहुत अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। इसलिए ऐसी जनजातियों के बीच जाकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़कर उनमें देशभक्ति की भावना जगाई जाएगी।


Samskruti renu ratha a mobile libraryदूरदर्शन केन्द्र जयपुर के निदेषक आर.पी.मीणा ने कहा कि स्वामीजी के संदेश किसी धर्म विशेष के लिए न होकर मानव मात्र के लिए हैं। विवेकानन्द का राजस्थान से विशेष लगाव था और वे खेतड़ी, किशनगढ़ और अजमेर आए थे। उनकी प्रेरणा से कई लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने कहा कि दूरदर्शन केन्द्र जयपुर ने भी उनके जीवन पर आधारित चार डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाई हैं। गोस्वामी अंजनकुमार (मन्दिर के महन्त) ने विवेकानन्द को युवाओं का प्रेरणा स़्त्रोत बताते हुए कहा कि आज जो युवा अपना मार्ग भटक गए हैं वे उनके बताए मार्ग पर चलें ताकि भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को आगे ले जाया जा सके।

अअमेरिका से आई श्रीमती रेणु मल्होत्रा जिनके सौजन्य से यह चल प्रदर्शनी राजस्थान को प्राप्त हुई है, ने कहा कि विदेशों में लोग हिन्दू धर्म के बारे में जानना चाहते हैं। उन्होंने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि एक बार चर्च में जब उन्हें हिन्दू धर्म के बारे में कुछ जानकारी देने के लिए कहा गया तो उन्होंने बताया कि हिन्दू धर्म तो बहुत आसान है ‘‘हम भी सुखी रहें आप भी सुखी रहो’’ यह प्रेरणा मुझे स्वामी विवेकानन्द की पुस्तकों से मिली। बंगाली मूल की श्रीमती मल्होत्रा बताती हैं कि 45 वर्ष पहले जब वे अमेरिका गई थीं तो उनकी माँ ने स्वामी विवेकानन्द की एक पुस्तक उन्हें दी थी तब से ही विवेकानन्द के विचारों की ओर उनका रुझान बढ़ता गया।
इस अवसर पर राजस्थान विवेकानंद केन्द्र के संचालक डाँ. बद्रीप्रसाद पंचोली, श्री सुदर्शन कुमार मल्होत्रा, लोग उपस्थित थे।